Friday, 18 December 2015

परमेश्वर श्रीमहाकाल की असीम अनुकम्पा से पाँचवी बार महारुद्राभिषेक पाठ करने का सौभाग्य मिलने वाला है, आप सभी मित्र भी इस यज्ञ में भाग लेकर पुण्यार्जन कर सकते हैं |
परमेश्वर श्रीमहाकाल की असीम अनुकम्पा से पाँचवी बार महारुद्राभिषेक पाठ करने का सौभाग्य मिलने वाला है, आप सभी मित्र भी इस यज्ञ में भाग लेकर पुण्यार्जन कर सकते हैं |

Tuesday, 10 November 2015

दीपोत्सव पर करें लक्ष्मी-कुबेर को प्रसन्न
महालक्ष्मी का प्राकट्यपर्व दीपावली 11 नवंबर बुधवार को है | देवराज इंद्र के अभद्र आचरण के कारण जब महर्षि दुर्वासा ने तीनों लोकों को श्रीहीन होने का श्राप दे दिया तो व्याकुल देवता त्रिदेवों की शरण में गए, महादेव ने उन्हें समुद्रमंथन का सुझाव दिया, जिसे देवता और दानव सहमत हो गए | मंथन की प्रक्रिया आरम्भ करने के लिए नागराज वासुकी को रस्सी और मंदराचल पर्वत को मथानी के रूप में उपयोग किया गया | समुद्रमंथन के मध्य कार्तिक कृष्णपक्ष अमावस्या को श्रीमहालक्ष्मी प्रकट हुईं थीं, तभी से इसदिन को श्रीमहालक्ष्मी की आराधना एवं प्रकाशपर्व के रूप में मनाया जाता है | इसदिन श्रीमहालक्ष्मी की पूजा के साथ-साथ श्रीगणेश, कुबेर नवग्रह,षोडशमातृका, सप्तघृत मातृका, दसदिक्पाल और वास्तुदेव का आवाहन-पूजन करने से वर्षपर्यंत अष्टलक्ष्मी की कृपा बनी रहती है | परिवार में मांगलिक कार्यों और सुख-शान्ति से आत्मसुख मिलता है | इसदिन घर में आरही लक्ष्मी की स्थिरता के लिए देवताओं के कोषाध्यक्ष धन एवं समृद्धि के स्वामी कुबेर का पूजन-आराधन करने से नष्ट हुआ धन भी वापस मिल जाता है, व्यापार वृद्धि हेतु कुबेर यंत्र श्रेष्ठतम् है इसे किसी भी तरह के सोने, चांदी, अष्टधातु, तांबे, भोजपत्र, आदि पर निर्मितकर पूजन करना श्रेष्ठ होता है इन्हीं वस्तुओं पर यंत्रराज श्रीयंत्र भी निर्मित कर सकते हैं ! गृहस्त लोगों के लिए महालक्ष्मी पूजन के समय सर्वप्रथम गणेश जी के लिए ॐ गं गणपतये नमः | कलश के लिए ॐ वरुणाय नमः | नवग्रह के लिए ॐ नवग्रहादि देवताभ्यो नमः | सोलह माताओं की प्रसन्नता के लिए ॐ षोडश मातृकायै नमः | लक्ष्मी के लिए ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः | कुबेर के लिए ॐ कुबेराय वित्तेश्वराय नमः | मंत्र का प्रयोग करना सर्वोत्तम रहेगा | अमावस्या के दिन अपने-अपने निवास स्थान में पूजा के लिए सायं 05 बजकर 30 मिनट से रात्रि 08 बजकर 42 मिनट तक का समय सर्वश्रेष्ठ रहेगा | इस अवधि के मध्य बुधवार दिन, प्रदोषबेला, स्थिर लग्न बृषभ, गुरु का नक्षत्र विशाखा, शुभ चौघडिया और तुला राशिगत सूर्य-चन्द्र की युति होने से दीपावली पूजन कई गुना अधिक शुभफलदायी रहेगा | साधकों के लिए ईष्ट आराधना, कुल देवी-देवता का पूजन, मंत्र सिद्धि अथवा जागृत करने, श्रीसूक्त, लक्ष्मी सूक्त, कनकधारा स्तोत्र, आदि का जप-पाठ करने के लिए उपयुक्त निशीथकाल का शुभसमय रात्रि 08 बजकर 43 मिनट से 10 बजकर 31 मिनट तक रहेगा ! तांत्रिक जगत के लिए महानिशीथ काल रात्रि 10 बजकर 32 मिनट से मध्यरात्रि 01 बजकर 34 मिनट तक रहेगा | पं जयगोविन्द शास्त्री

Sunday, 8 November 2015

आरोग्य शरीर के लिए करें धन्वंतरी की पूजा 'धनतेरस'
भगवान् विष्णु के अंशावतार एवं देवताओं के वैद्य भगवान धन्वन्तरि का प्राकट्य पर्व कार्तिक कृष्णपक्ष त्रयोदशी को मनाया जाता है | पूर्वकाल में देवराज इंद्र के अभद्र आचरण के परिणामस्वरूप महर्षि दुर्वासा ने तीनों लोकों को श्रीहीन होने का श्राप दे दिया था जिसके कारण अष्टलक्ष्मी पृथ्वी से अपने लोक
चलीं गयीं | पुनः तीनोलोकों में श्री की स्थापना के लिए व्याकुल देवता त्रिदेवों के पास गए और इस संकट से उबरने का उपाय पूछा, महादेव ने समुद्रमंथन का सुझाव दिया जिसे देवताओं और दैत्यों ने सहर्ष स्वीकार कर लिया | समुद्र मंथन की भूमिका में मंदराचल पर्वत को मथानी और नागों के राजा वासुकी को मथानी के लिए रस्सी बनाया गया | वासुकी के मुख की ओर दैत्य और पूंछ की ओर देवताओं को किया गया मंथन आरम्भ हुआ, समुद्रमंथन से चौदह प्रमुख रत्नों की उत्पत्ति हुई जिनमें चौदहवें रत्न के रूप में स्वयं भगवान् धन्वन्तरि प्रकट हुए जो अपने हाथों में अमृतकलश लिए हुए थे | भगवान् विष्णु ने इन्हें देवताओं का वैद्य एवं वनस्पतियों और औषधियों का स्वामी नियुक्त किया | इन्हीं के वरदान स्वरूप सभी वृक्षों-वनस्पतियों में रोगनाशक शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ | आजकल व्यापारियों ने धनतेरस का भी बाजारीकरण हो गया है और इसदिन को विलासिता पूर्ण वस्तुओं के क्रय का दिन घोषित कर रखा है जो सही नहीं है इसका कोई भी सम्बन्ध धन्वन्तरि से नहीं है ये आरोग्य और औषधियों के देव हैं न कि हीरे-जवाहरात या अन्य भौतिक वस्तुओं के |अतः इसदिन इनकी पूजा-आराधना अपने और परिवार के स्वस्थ शरीर के लिए करें क्योंकि संसार का सबसे बड़ा धन आरोग्य शरीर है | आयुर्वेद के अनुसार भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति स्वस्थ शरीर और दीर्घायु से ही संभव है, शास्त्र भी कहते हैं कि 'शरीर माध्यम खलु धर्म साधनम्' अर्थात धर्म का साधन भी निरोगी शरीर ही है तभी आरोग्य रुपी धन के लिए ही भगवान् धन्वन्तरि की पूजा आराधना की जाती है | ऐसा माना जाता है की इस दिन की आराधना प्राणियों को वर्षपर्यंत निरोगी रखती है | समुंद मंथन की अवधि के मध्य शरद पूर्णिमा को चंद्रमा, कार्तिक द्वादशी को कामधेनु गाय, त्रयोदशी को धन्वंतरी और अमावस्याको महालक्ष्मी का प्रादुर्भाव हुआ | धन्वंतरी ने ही जनकल्याण के लिए अमृतमय औषधियों की खोज की थी | इन्हीं के वंश में शल्य चिकित्सा के जनक दिवोदास हुए महर्षि विश्वामित्र के पुत्र सुश्रुत उनके शिष्य हुए जिन्होंने आयुर्वेद का महानतम ग्रन्थ सुश्रुत संहिता की रचना की | पं जयगोविन्द शास्त्री

Monday, 12 October 2015

नवरात्र मे कलश स्थापन
शक्ति आराधना का मुख्यपर्व शारदीय नवरात्र 13 अक्टूबर मंगलवार से आरम्भ होकर 22 अक्टूबर गुरुवार तक चलेगा | शास्त्रों के अनुसार
नवरात्र व्रत-पूजा में कलश स्थापन का महत्व सर्वाधिक है, क्योंकि कलश में ही ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र,  नवग्रहों, सभी नदियों, सागरों-सरोवरों, सातों द्वीपों, षोडश मातृकाओं, चौसठ योगिनियों सहित सभी तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं का वास रहता है, तभी तो विधिपूर्वक कलश पूजन से सभी देवी-देवताओं का पूजन हो जाता है | जो आराधक नौ दिनों के लिए व्रत-संकल्प करते हैं अथवा श्रीदुर्गासप्तशती का पाठ करवाते हैं उनके लिए कलश स्थापन आवश्यक है, जो लोग व्रत और पाठ दोनों करते हैं किन्तु प्रतिदिन यात्रादि करते हैं उनके लिए घटस्थापन आवश्यक नहीं है वे अपने विश्रामस्थल पर ही दीप अथवा धूप प्रज्जलित करके जप-पाठ आदि कर सकते हैं | धर्मग्रंथों के अनुसार नवरात्र के दिन सूर्योदय से 4घंटे तक के मध्य कलश स्थापन का विधान है, लेकिन यदि इसदिन चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग हो तो यह काल दूषित हो जाता है, ऐसे संयोग के समय अभिजित मुहूर्त के मध्य घटस्थापन का विधान है | ध्यान दें कि इसवर्ष की नवरात्र प्रतिपदा चित्रा नक्षत्र एवं वैधृति योग से दूषित है, इसलिए प्रथम 4घंटे छोड़कर अभिजित मुहूर्त में दिन के 11 बजकर 49 मिनट से 12 बजकर 37मिनट के मध्य ही कलश स्थापन और दीप पूजन शुभ रहेगा |नवरात्र प्रतिपदा को सुबह स्नान आदि करके माँ दुर्गा, भगवान् गणेश, नवग्रह कुबेरादि की मूर्ति और कलश लें | कलश सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिटटी का होना चाहिए, लोहे अथवा स्टील का कलश पूजा मे प्रयोग न करें | कलश के ऊपर रोली से ॐ तथा स्वास्तिक बनाएं |अपने पूजागृह में अथवा घर के आँगन से पोर्वोत्तर भाग में जो सुरक्षित और उचित स्थान हो वहीँ घटस्थापन सुनिश्चित करें | सर्वप्रथम भगवान् विष्णुका नाम लेकर स्वयं को जल से अभिमंत्रित करें पश्च्यात आचमन आदि करके 'ॐ भूम्यै नमः' कहते हुए पृथ्वी को स्पर्श करें विघ्नहर्ता गणेश को नमस्कार करें और पूजा स्थल से दक्षिण-पूर्व की ओर घी का दीपक जलाते हुए, 'ॐ दीपो ज्योतिः परब्रह्म दीपो ज्योतिर्र जनार्दनः ! दीपो हरतु में पापं पूजा दीप नमोऽस्तु ते' यह मंत्र पढ़ें | कोई अन्य मंत्र न आता हो तो दिए गए नवार्ण मंत्र के द्वारा ही हल्दी, अक्षत और पुष्प लेकर मानसिक संकल्प लें, कि माँ मैं आज नवरात्र की प्रतिपदा से आप की आराधना 'अमुक' कार्य के लिए कर रहा-रही हूँ, मेरी पूजा स्वीकार कर ईष्टकार्य सिद्ध करो | तत्पश्च्यात कलश में जल-गंगाजल डालें और 'ॐ वरुणाय नमः' कहते हुए पूर्णरूप से भर दें | नवार्ण मंत्र 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे' पढ़ते हुए कलश में लौंग, इलायची, पान, सुपारी, रोली, मोली, चन्दन, अक्षत, हल्दी, रुपया पुष्पादि डालें,पश्च्यात आम का पल्लव डाले, यदि यह सुलभ न हो तो पीपल, बरगद, गूलर अथवा पाकर का पल्लव कलश के ऊपर रख सकते हैं उसके पश्च्यात जौ अथवा कच्चा चावल जिस धातु का कलश हो उसी धातु के कटोरे मे भरकर कलश के ऊपर रखें और उसके ऊपर चुन्नी से लिपटा हुआ नारियल रखें, पूजन सामग्री के अभाव में केवल हल्दी अक्षत और पुष्प से ही माँ की आराधना करें संभव हो तो श्रृंगार का सामान और नारियल-चुन्नी जरुर चढ़ाएं | विद्यार्थी वर्ग 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महासरस्वती देव्यै नमः' मंत्र का जप करें तो प्रतियोगिता में सफल रहेंगें | जिन लोंगों पर भारी क़र्ज़ हो चुका हो वे 'या देवि ! सर्व भूतेषु लक्ष्मी रूपेण संस्थिता ! नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ! का जप करें |जिन युवकों का विवाह न हो रहा हो, वै 'पत्नी मनोरमां देहि ! मनो वृत्तानु सारिणीम तारिणीम दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम ! का जप करके मनोनुकूल जीवन साथी पा सकते हैं ! जो कुंवारी कन्यायें हैं, तमाम प्रयासों के बावजूद जिनका विवाह न हो रहा हो वै ॐ कात्यायनि महामाये !महायोगिन्यधीश्वरी ! नन्द गोप सुतं देवि ! पतिं मे कुरु ते नमः | मंत्र का जप करके ईष्ट जीवनसाथी पा सकती हैं | पं जयगोविन्द शास्त्री 

Sunday, 27 September 2015

पितृपक्ष पर्व 28 सितंबर से
अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान एवं श्रद्धा प्रकटकर आशीर्वाद प्राप्ति का पवित्रपर्व श्राद्ध 28 सितंबर सोमवार से आरम्भ हो रहा है, इसदिन प्रतिपदा तिथि सुबह 08 बजकर 20 मिनट पर ही आरंभ हो रही है, अतः प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध इसीदिन दोपहर 11बजकर 36 मिनट से 12 बजकर 24 मिनट तक के मध्य करना शुभ रहेगा | शास्त्रों-पुराणों में पितृों की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि पितृो वै जनार्दनः, पितृो वै वेदाः, पितृो वै ब्रह्मः, पितृ ही जनार्दन हैं, पितृ ही वेद है, पितृ ही ब्रह्म हैं, अतः जन्म-जन्मान्तर तक अनेकों योनियों में भटकते हुए जीव जब मनुष्य योनि में आता है तो उसे पितृरुपी जनार्दन के प्रतिश्राद्ध-तर्पण करने का अवसर मिलता है जिससे उसे वर्तमान के साथ-साथ भविष्य में भी होनेवाले जन्मों में उत्तम लोक और उत्तम योनि प्राप्त हो | जो मनुष्य वर्ष पर्यन्त दान-पुण्य, पूजा-पाठ आदि नहीं करते वै भी आश्विन माह के कृष्ण पक्ष में केवल अपने पितृों का श्राद्ध-तर्पण करके ईष्टकार्यसिद्धि एवं उन्नति प्राप्त कर सकते हैं | एक वर्ष में बारह महीने की बारह अमावस्यायें, सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग के प्रारम्भ की चारों तिथियाँ, मनुवों के आरम्भ की चौदह मन्वादि तिथियाँ, बारह संक्रांतियां, बारह वैधृति योग, बारह व्यतिपात योग, पंद्रह महालय-श्राद्ध पक्ष की तिथियाँ, पांच अष्टका, पांच अन्वष्टका और पांच पूर्वेद्युह ये श्राद्ध करने के 96 अवसर हैं जिनमें मनुष्य अपने पूर्जवों के प्रति श्राद्ध तर्पण करके पितृदोष से मुक्ति पा सकता है | जिन जातकों की जन्मकुंडलियों में पितृदोष हो, उनके लिए तो यह अवसर वरदान की तरह है क्योंकि इन्हीं दिनों पितृ पृथ्वी पर पधारते हैं | श्राद्ध का समय आ गया है ऐसा विचार करके पितृ अपने-अपने कुलों में मन के सामान तीव्र गति से आ पहुचते हैं, और जिन ब्राह्मणों को श्राद्ध में भोजन कराया जाता है,उन्हीं के शरीर में प्रविष्ट होकर पितृगण भी भोजन करते हैं, उसके बाद अपने कुल के श्राद्धकर्ता को आशीर्वाद देकर पुनः पितृलोक चले जाते हैं | किसी भी माह की जिस तिथि में परिजन की मृत्यु हुई हो श्राद्धपक्ष में उसी तिथि के आने पर अपने पितृ का श्राद्ध करें | पति के रहते ही जिनकी मृत्यु हो गयी हो उन नारियों का श्राद्ध नवमी तिथि में करें | एकादशी में वैष्णव सन्यासी का श्राद्ध, शस्त्र, आत्म हत्या, विष, वाहन दुर्घटना,सर्पदंश, ब्राह्मण श्राप ,वज्रघात, अग्नि से जले हुए, दंतप्रहार-पशु से आक्रमण, फांसी लगाकर मृत्य, ज्वरप्रकोप, क्षयरोग, हैजा, डाकुओं के मारे जाने से हुई मृत्यु वाले पूर्जवों का श्राद्ध चतुर्दशी को करें | जिन पूर्जवों की तिथि ज्ञात न हो एवं मृत्यु पश्च्यात अंतिम संस्कार न हुआ हो उनका श्राद्ध-तर्पण अमावस्या को करना चाहिए | सभी पितृों के स्वामी भगवान् विष्णु के शरीर के पसीने से तिल की और रोम से कुश की उतपत्ति हुई है, अतः तर्पण और अर्घ्य के समय तिल और कुश का प्रयोग करें |
 पं जय गोविन्द शास्त्री 

Wednesday, 16 September 2015

सिद्धि विनायक चतुर्थी 17 सितंबर को
सभी प्रकार की विपत्तियों का हरण करके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाले श्रीसिद्धि विनायक गणेश का जन्मदिन
भौदों शुक्लपक्ष चतुर्थी बृहस्पतिवार को मनाया जायेगा | गणेशभक्तों के लिए सबसे बड़ी खुशखबरी यह है कि इस वर्ष का जन्मदिन स्वयं गणेश के जन्म नक्षत्र स्वाति में ही पड़ रहा है जो अत्यंत दुर्लभ संयोग है, अतः इस वर्ष की विनायक आराधना का फल परम शुभकारी और कर्ज से मुक्ति दिलाने वाला सिद्ध होगा | गणेश सभी गणों, ॠद्धियों और सिद्धियों के स्वामी हैं जो सरल पूजा-पाठ से ही प्रसन्न होकर अपने भक्तों का अभीष्ट फल प्रदान करते हैं | पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पंचभूतों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश में पृथ्वी शिव, जल गणेश, तेज-अग्नि शक्ति, वायु सूर्य और आकाश विष्णु हैं इन पांच तत्वों के वगैर जीव-जगत की कल्पना नहीं की जा सकती | जल तत्व के अधिपति गणेश हर जीव में रक्त रूप में विराजते हुए चारों देवों सहित पंचायतन में पूज्य हैं जैसे श्रृष्टि का कोई भी शुभ-अशुभ कार्य जल के बिना पूर्ण नहीं हो सकता वैसे ही गणेश पूजन के बिना कोई भी जप-तप, अनुष्ठान आदि कर्म पूर्ण नहीं नहीं हो सकते | ज्योतिषशास्त्र में अश्विनी आदि सभी नक्षत्रों के अनुसार देवगण, मनुष्यगण और राक्षसगण इन तीनो गणों के ईश गणेश ही हैं | 'ग' ज्ञानार्थवाचक और 'ण' निर्वाणवाचक है 'ईश' अधिपति हैं अर्थात ज्ञान-निर्वाणवाचक गण के ईश गणेश ही परब्रह्म हैं | योग-शास्त्रीय साधना में शरीर में मेरुदंड के मध्य जो सुषुम्ना नाडी है, वह ब्रह्मरंध्र में प्रवेश करके मष्तिष्क के नाडी समूह से मिलजाती है इसका आरम्भ मूलाधार चक्र ही है इसी 'मूलाधार चक्र' को गणेश स्थान कहते हैं |गणेश्वरो विधिर्विष्णु: शिवो जीवो गुरुस्तथा | षडेते हंसतामेत्य मूलाधारादिषु स्थिताः | आध्यात्मिक भाव से विनायक जगत की आत्मा है सबके स्वामी हैं सबके ह्रदय की बात समझ लेने वाले सर्वज्ञ हैं ! इन्द्रियों के स्वामी होने से भी इन्हें गणेश कहा गया है | इनका सर हाथी का और वाहन मूषक है | ये पाश, अंकुश और वरमुद्रा धारण करते हैं पाश मोह का प्रतीक है जो तमोगुण प्रधान है अंकुश वृत्तियों का प्रतीक है जो रजोगुण प्रधान है वरमुद्रा सत्वगुण का प्रतीक है इनकी उपासना करके प्राणी तमोगुण, रजोगुण और सतोगुण से ऊपर उठकर इनकी कृपा का पात्र बनता है | हम इस वर्ष की अति शुभफल कारी सिद्धिविनायक चतुर्थी का भक्ति-भाव से पूजन करके अपने सकल मनोरथ सिद्ध करसकते हैं | पं जयगोविन्द शास्त्री